जसवंत सिंह खालरा केस और एक पत्नी की दशकों लंबी लड़ाई… क्या है सतलुज की असली कहानी?

By Digital DeskEdited By: Abhishek Pratap Singh
Updated: Mon, 06 Jul 2026 04:18 PM (IST)
दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और पंजाब में फर्जी मुठभेड़ों पर आधारित है। ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 से फिल्म हटाए जाने के बाद इसकी लगातार चर्चा हो रही है।
HighLights
- फिल्म ‘सतलुज’ जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित।
- खालरा ने पंजाब में लापता लोगों की जांच की थी।
- पंजाब पुलिस के अधिकारियों को उम्रकैद की सजा मिली।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। फिल्म अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज की काफी चर्चा हो रही है। कानूनी और सर्टिफिकेशन से जुड़ी कई मुश्किलों के बाद 3 जुलाई को आखिरकार जी5 ने पहले इस फिल्म को ओटीटी पर रिलीज किया और अब हटा दिया है।
यह फिल्म 2022 में बनकर तैयार हो गई थी लेकिन लंबे समय तक सर्टिफिकेशन के पचड़े में फंसी रही। इसी वजह से 2023 में ये टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में तय प्रीमियर में शामिल नहीं हो पाई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है जो इतने फसाद में फंसी हुई है।
किस पर आधारित है यह फिल्म?
दिलजीत की सतलुज मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की जिंदगी और पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर आधारित है। जसवंत सिंह खालरा ने 1984 से 1994 के बीच पंजाब में लापता हुए हजारों अज्ञात लोगों और उनके कथित अंतिम संस्कार के मामले की जांच की थी। उनकी इस जांच ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर ला खड़ा किया था। इस मुद्दे को उठाने के बाद जसवंत सिंह खुद लापता हो गए।

6 सितंबर 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क में सुबह करीब 9:20 बजे मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा अपने घर के बाहर अपनी कार धो रहे थे तभी पंजाब पुलिस ने उनका अपहरण कर लिया। इसके बाद वे कभी नहीं दिखे।
खालरा की पत्नी ने शुरू की लड़ाई
1995 से उनकी पत्नी परमजीत कौर खालरा ने यह सुनिश्चित किया है कि उनके पति का काम और बलिदान लोगों की यादों से मिट न जाए। इसके बाद उन्होंने अपने पति के लिए न्याय पाने के लिए दशकों तक चलने वाली लड़ाई शुरू की। खालरा की कहानी पर आधारित और दिलजीत दोसांझ की मुख्य भूमिका वाली फिल्म सतलुज से जुड़े ताजा विवाद ने उस संघर्ष को एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

आइए, खालरा के लापता होने के बाद चली कानूनी लड़ाई पर एक नजर डालते हैं…
एक टेलीग्राम जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा
सितंबर 1995 में एक संदेश सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में नहीं बल्कि जस्टिस कुलदीप सिंह के आवास-कार्यालय में पहुंचा। शिरोमणि अकाली दल के तत्कालीन वरिष्ठ नेता गुरचरण सिंह टोहरा द्वारा भेजे गए उस टेलीग्राम में एक गंभीर आरोप लगाया गया था कि मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा को पंजाब पुलिस ने अगवा कर लिया था।
दावे की तात्कालिकता ने एक असाधारण न्यायिक प्रतिक्रिया को प्रेरित किया। 11 सितंबर 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने टेलीग्राम को ही हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका माना और पंजाब के गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और अमृतसर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को एक हफ्ते के अंदर जवाब देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने आरोपों की गंभीरता को देखते हुए यह भी आदेश दिया कि टेलीक्स, टेलीफोन और फैक्स के जरिए तुरंत नोटिस भेजे जाएं।
लगभग उसी समय खालरा की पत्नी परमजीत कौर ने भी संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) रिट की मांग की और कहा कि उनके पति को अदालत के सामने पेश किया जाए।
उनकी याचिका के अनुसार, खालरा का 6 सितंबर, 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क स्थित उनके घर के बाहर दिन-दहाड़े अपहरण कर लिया गया था और बाद में उनकी हत्या कर दी गई थी।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि सुबह करीब 9:20 बजे जब खालरा अपने घर के बाहर अपनी कार धो रहे थे तो उनके पास एक आसमानी नीले रंग की मारुति वैन आकर रुकी। आरोप है कि पुलिस की वर्दी पहने, सिर पर काली पगड़ी (पटका) बांधे और ऑटोमैटिक हथियार लिए चार हथियारबंद लोग उस गाड़ी से उतरे और उन्होंने खालरा के विरोध के बावजूद उन्हें काबू में किया और जबरदस्ती वैन में बिठा लिया।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि उन लोगों ने वॉकी-टॉकी पर बातचीत की और एक सीनियर अफसर को बताया कि खालरा को हिरासत में ले लिया गया है और मिशन पूरा हो गया है। आरोप है कि उसके ठीक पीछे पुलिस की एक जिप्सी चल रही थी, जिसमें कई हथियारबंद जवान और एक सीनियर अफसर सवार थे। ऐसा लग रहा था कि वे वैन को दूर जाते समय सुरक्षा दे रहे थे।
याचिका में कहा गया है कि कथित अपहरण एक व्यस्त रिहायशी इलाके में सबके सामने हुआ। याचिका में बताए गए मुख्य गवाहों में से एक राजीव सिंह थे, जिनके बारे में कहा गया कि उन्होंने यह घटना बहुत करीब से देखी थी। याचिका के अनुसार, उन्होंने बीच-बचाव करने की कोशिश की लेकिन उन्हें एक तरफ धकेल दिया गया।
कहा जाता है कि उन्होंने वॉकी-टॉकी पर हो रही बातचीत सुनी और मारुति वैन का रजिस्ट्रेशन नंबर नोट कर लिया। याचिका में यह भी दावा किया गया कि कई पड़ोसियों ने इस घटना को देखा, क्योंकि यह सुबह की उस भागदौड़ के समय हुई थी जब लोग काम पर जा रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट का दखल
खालरा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को तीन महीने के अंदर जांच पूरी करने का निर्देश दिया। 30 जुलाई 1996 को सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी जांच रिपोर्ट सौंपी, जिसमें पंजाब पुलिस के नौ अधिकारियों को जसवंत सिंह खालरा के अपहरण के लिए जिम्मेदार बताया गया और उन पर मुकदमा चलाने की सिफारिश की गई।
जांच में यह सबूत भी मिले कि पुलिस द्वारा उठाए जाने के बाद जसवंत सिंह खालरा को तरनतारन जिले के कांग पुलिस स्टेशन में रखा गया था लेकिन 24 अक्टूबर 1995 को उन्हें वहां से कहीं और ले जाया गया, जिसके बाद उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली।
1996 में सुप्रीम कोर्ट ने जसवंत सिंह खालरा के अपहरण के मामले का दायरा और बढ़ा दिया। शीर्ष अदालत ने शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार विंग द्वारा 16 जनवरी 1995 को जारी एक प्रेस नोट से जुड़े एक और मुद्दे पर भी संज्ञान लिया।
खालरा और जेएस ढिल्लों द्वारा हस्ताक्षरित इस नोट में आरोप लगाया गया था कि पंजाब पुलिस ने बड़ी संख्या में लोगों को अज्ञात बताकर उनका गैर-कानूनी तरीके से अंतिम संस्कार कर दिया था। इन आरोपों को भयावह बताते हुए और यह चेतावनी देते हुए कि इनकी आंशिक जांच से भी मानवाधिकारों के उल्लंघन की एक खौफनाक कहानी सामने आएगी, सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को एक उच्च-स्तरीय जांच करने का आदेश दिया।

दिसंबर 1996 में सौंपी गई सीबीआई की अंतिम रिपोर्ट में पाया गया कि 585 शवों की पूरी तरह से पहचान हो चुकी थी, 274 की आंशिक रूप से पहचान हुई थी और 1,238 शवों की पहचान नहीं हो पाई थी। जांच के नतीजों में बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन पाए जाने पर अदालत ने सीबीआई को जांच जारी रखने और जरूरत पड़ने पर आपराधिक मामले दर्ज करने का निर्देश दिया, साथ ही इस व्यापक मुद्दे को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को सौंप दिया।
अदालत ने आयोग से पहचान किए गए पीड़ितों के परिवारों के मुआवजे के दावों की जांच करने को भी कहा और यह भी तय किया कि मानवाधिकार आयोग द्वारा दिया गया कोई भी मुआवजा बाध्यकारी और लागू करने योग्य होगा।
खालरा मामले में पंजाब पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के गायब होने और उनकी हत्या के 16 साल बाद नवंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पंजाब पुलिस के पांच अधिकारियों को सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने 2007 में इन पांच पुलिस अधिकारियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इनमें उस समय के एक हेड कॉन्स्टेबल, तीन सब-इंस्पेक्टर और एक डीएसपी शामिल थे।
हाई कोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने 16 अक्टूबर 2007 को पंजाब की निचली अदालत द्वारा दी गई सात साल की सजा को बढ़ाकर उम्रकैद कर दिया था। पंजाब की पटियाला अदालत ने खालरा की हत्या का दोषी मानते हुए इन पांच पुलिस अधिकारियों को सात साल की सजा सुनाई थी।
इससे नाराज होकर पांचों ने सजा को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसने सजा को बढ़ाकर उम्रकैद कर दिया। इसके बाद आरोपियों ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पी सदाशिवम और जस्टिस बीएस चौहान की डिवीजन बेंच ने हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करने से इनकार कर दिया और उन्हें दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।
सीबीआई की ओर से पेश हुए भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल मोहन जैन ने कहा था कि ऐसे मामले राज्य की कानून लागू करने वाली एजेंसियों में आम आदमी के भरोसे को चुनौती देते हैं और इसलिए यह कोर्ट का कर्तव्य है कि वे इस कम होते भरोसे को पक्का करने के लिए सख्ती से कदम उठाएं और एक मिसाल कायम करें।
